Tuesday, 2 April 2019

Kotilingeshwar कोटिलिंगेश्वर मंदिर कोलार








यूं तो आपने महादेव के कई मंदिरों के दर्शन किए होंगे, उनके कई रूप भी देखे होंगे. जरा सोचिए अगर मंदिर का आकार ही महादेव की महिमा सुनाए और मंदिर में प्रवेश करते ही महादेव की शक्ति का अंदाजा हो जाए तो भला इससे ज्यादा सौभाग्य की क्या बात होगी. कर्नाटक के कोलार जिले में दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग मौजूद है, जिसके चारों तरफ मौजूद करोंड़ों शिवलिंग शिव के प्रति उनके भक्तों की भक्ति की अनूठी कहानी सुनाते हैं.
पावन, सुंदर और शांत प्रकृति के हरियाले आंचल में बसा है महादेव का एक ऐसा मंदिर जो खुद बयां करता है इस मंदिर के सबसे अनोखे होने की कहानी. मन को हर लेने वाली इसकी सुंदरता में स्वयं महादेव का वास होता है और यहां कण-कण शिव की शक्ति की कहानी सुनाता है . इसी मंदिर में दुनिया के सबसे ऊंचे शिवलिंग के साथ ही करीब 1 करोड़ शिवलिंग भी हैं.
इसे कोटिलिंगेश्वर धाम कहते हैं, जो कर्नाटक के कोलार जिले के एक छोटे से गांव काम्मासांदरा में बसा है. इस मंदिर में प्रवेश करते ही भक्तों की नजरें एक टक केवल मंदिर के आकार को ही निहारती हैं क्योंकि यहां बसा है महादेव का वो रूप, जो शायद दुनिया भर में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है. यहां मंदिर का आकार ही शिवलिंग के रूप में है, जो दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग भी है. शिवलिंग रूप में इस मंदिर की ऊंचाई 108 फीट है. जिसके दर्शन कर श्रद्धालु पूरी तरह से शिवमय हो जाते हैं और इसकी गवाही देते हैं मंदिर के चारों ओर मौजूद करीब 1 करोड़ शिवलिंग.
कोई भी अचम्‍भे में पड़ सकता है कि आखिर मुख्य मंदिर के आस-पास लाखों शिवलिंग क्यों स्थापित हैं. यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना में इस अचम्‍भे का राज छिपा है. इस मंदिर में भक्त अपने मन में सच्ची श्रद्धा लिए आते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार 1 फीट से लेकर 3 फीट तक के शिवलिंग अपने नाम से यहां स्थापित करवाते हैं. ये महादेव की महिमा ही है कि अब इन शिवलिंगों की संख्या करीब 1 करोड़ तक पहुंच चुकी है.
इस विशाल शिव-लिंग के सामने नंदी भव्य और विशाल रूप में दर्शन देते हैं, जिसकी ऊंचाई 35 फीट है और वह 60 फीट लंबे, 40 फुट चौड़े और 4 फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है. इस विशाल शिव-लिंग के चारों ओर देवी मां, श्री गणेश, श्री कुमारस्वामी और नंदी महाराज की प्रतिमाएं ऐसे स्थापित हैं जैसे वे अपने आराध्य को अपनी पूजा अर्पण कर रहे हों. मंदिर का यही अद्भुत रूप और हर मन्नत पूरी होने की मान्यता ही दूर-दूर से हजारों भक्तों को यहां खींच लाती है.
मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही कोटिलिंगेश्वर की प्रतिमा में भक्तों को साक्षात महादेव के दर्शनों की अनुभूति होती है और कोटिलिंगेश्वर रूप में भोले अपने भक्तों के कष्टों को हरने के लिए आतुर दिखायी देती हैं. इस पूरे मंदिर परिसर में कोटिलिंगेश्वर के मुख्य मंदिर के अलावा 11 मंदिर और भी हैं, जिनमें ब्रह्माजी, विष्णुजी, अन्न्पूर्णेश्वरी देवी, वेंकटरमानी स्वामी, पांडुरंगा स्वामी, पंचमुख गणपति, राम-लक्ष्मण-सीता के मंदिर मुख्य रूप से विराजमान हैं.
मान्यता है की मंदिर परिसर में मौजूद दो वृक्षों पर पीले धागे को बांधने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है. विशेषकर शादी-ब्याह में आने वाली अड़चनें दूर हो जाती हैं. मंदिर की तरफ से भी निर्धन-गरीब परिवारों की कन्याओं का विवाह नाममात्र का शुल्क लेकर करवाया जाता है. सारी व्यवस्था मंदिर की तरफ से की जाती है. वहीं, दूर-दूर से आने वाले भक्तों के रहने-खाने का भी यहां उचित इंतजाम किया जाता है. महाशिवरात्रि पर तो इस मंदिर की छटा देखते ही बनती है. अपने आराध्य देव को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण कर पुण्य लाभ कमाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 2 लाख तक पहुंच जाती है.

Sunday, 31 March 2019

KOTILINGSHWARA TEMPLE KOLAR BK BHAGWAN BHAI VISIT कोतिलिंगेश्वारा मन्दिर Wonderful God Shiva

भगवान भाई ने कहा की शिव सर्वआत्माओं के परमपिता हैं परमपिता परमात्मा शिव का यही परिचय यदि सर्व मनुष्यात्माओं को दिया जाए तो सभी सम्प्रदायों को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है, क्योंकि परमात्मा शिव का स्मृतिचि- शिवलिंग के रूप में सर्वत्र सर्वधर्मावलंबियों द्वारा मान्य है। भगवान शिव एक ही हैं तो सभी धर्मों से भावनात्मक एकता हो सकती है। इसी प्रकार ओल्ड टेस्टामेंट में मूसा ने जेहोवा का वर्णन किया है। भगवान भाई ने कहा वह ज्योतिर्बिंदु परमात्मा का ही यादगार है। इस प्रकार विभिन्न धर्मों के बीच मैत्री भावना स्थापित हो सकती है। रामेश्वरम्‌ में राम के ईश्वर शिव, वृंदावन में श्रीकृष्ण के ईष्ट गोपेश्वर तथा एलीफेंटा में त्रिमूर्ति शिव के चित्रों से स्पष्ट है कि सर्वात्माओं के आराध्य परमपिता परमात्मा शिव ही हैं। शिवरात्रि का त्योहार सभी धर्मों का त्योहार है तथा सभी धर्मवालों के लिए भारतवर्ष तीर्थ है। यदि इस प्रकार का परिचय दिया जाता है तो विश्व का इतिहास ही कुछ और होता तथा साम्प्रदायिक दंगे, धार्मिक मतभेद, रंगभेद, जातिभेद इत्यादि नहीं होते। चहुँओर भ्रातृत्व की भावना होती। आज पुनः वही घड़ी है, वही दशा है, वही रात्रि है जब मानव समाज पतन की चरम सीमा तक पहुँच चुका है। ऐसे समय में कल्प की महानतम घटना तथा दिव्य संदेश सुनाते हुए हमें अति हर्ष हो रहा है कि कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के इस संगमयुग पर ज्ञान-सागर, प्रेम वकरुणा के सागर, पतित-पावन, स्वयंभू परमात्मा शिव हम मनुष्यात्माओं की बुझी हुई ज्योति जगाने हेतु अवतरित हो चुके हैं। वे साकार प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम द्वारा सहज ज्ञान व सहज राजयोग की शिक्षा देकर विकारों के बंधन से मुक्त कर निर्विकारी पावन देव पद की प्राप्ति कराकर दैवी स्वराज्य की पुनः स्थापना करा रहे हैं।