5000 स्कूल कॉलेजो में और 800 जेलों कारागृह में नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया है जिससे इनका नाम इंडिया बुक रिकार्ड में दर्ज है ब्रह्माकुमारीज़ माउंट आबू में ईश्वरीय सेवा में 35 वर्षो से समर्पित है.
Saturday, 12 November 2011
राजयोग का आधार और विधी योग का अति सरल अर्थ है - किसी की याद. किसी भी याद आना या किसी को याद करना - यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है. मन जिस विषय पर सोचता है, उसी के साथ उस आत्मा का योग है. फिर वह चाहे व्यक्ति, वस्तु, वौभव या परिस्थिति हो या परमात्मा ही क्यों न हो. अब मन कहाँ-कहाँ जा सकता है, मन का कहीं भी जाने का आधार क्या हैं ? संसार में करोड़ो मनुष्य है लेकिन मन सभी के विषय में नहीं सोचता है. मन उसी के बारें में सोचेगा, जिसका उसे परिचय हो तो पहला आधार है परिचय. फिर जिसके साथ सम्बन्ध
राजयोग का आधार और विधी योग का अति सरल अर्थ है - किसी की याद. किसी भी याद आना या किसी को याद करना - यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है. मन जिस विषय पर सोचता है, उसी के साथ उस आत्मा का योग है. फिर वह चाहे व्यक्ति, वस्तु, वौभव या परिस्थिति हो या परमात्मा ही क्यों न हो. अब मन कहाँ-कहाँ जा सकता है, मन का कहीं भी जाने का आधार क्या हैं ? संसार में करोड़ो मनुष्य है लेकिन मन सभी के विषय में नहीं सोचता है. मन उसी के बारें में सोचेगा, जिसका उसे परिचय हो तो पहला आधार है परिचय. फिर जिसके साथ सम्बन्ध तीसरा आधार है स्नेह. जिससे स्नेह होता है उसके पास मन अपने आप चला जाता है. चौथा आधार है प्राप्ति. जहाँ से किसी को प्राप्ति होगी वहाँ से वह अपना मन हटाना ही नही चाहेंगा. तो किसी की भी याद के लिए मुख्य चार आधार है - परिचय, सम्बधन्ध, स्नेह और प्रापित. इनहीं चा आधारों के कारण मनुष्य की याद सदा बदलती ही रहती है या परिवर्तनशील होती है. एक बालक का योग अपनी माता के साथ है क्योंकि उसको केवल माँ का परिचय है. माँ से ही उसे स्नेह मिलता है, भोजन मिलता है. माँ को न देखने पर वह रोता है और माँ के उसे उठाने पर वह चुप हो जाता है. इससे सिध्द है कि उसका योग अपनी माता के साथ है. बालक थोड़ा बड़ा होने पर खेलकूद में रस लेने लगता है तब उसका योग माँ से परिवर्तित होकर अपने दोस्तों और खेल में जुट जाता है और माँ का बुलावा भी वह टालने की कोशिश करता है. विद्यार्थी जीवन में बच्चे का योग अपनी पढ़ाई, पाठशाला और शिखक से हो जाता है. व्यावहारिक जीवन में आने के बाद उसका योग - धन, सम्पत्ति, मर्तबा, इज्जत, अन्य सम्पर्क मंे आने वाले व्यक्तियों के साथ हो जाता है, विवाह होने पर कुछ समय के लिए उसका योग पत्नी के साथ हो जाता है. सन्तान होने पर पत्नी से भी योग हटकर सन्तान से हो जाता है. बीमारी के दिनों में पूरा ही योग डॉक्टर के साथ होता है. क्योंकि उससे ही इलाज होना है. इस प्रकार योग परिवर्तनशील है तो फिर देहधारियोंे से योग हटाकर परमात्मा से योग लगाना कठिन क्यों होना चाहिए, जहाँ परिचय, सम्बध, स्नेह और प्राप्ति है वहाँ योग लगाना बड़ा ही सहज है, अब ये चारों ही आधार परमात्मा से जोड़े जाएँ तो राजयोग कोई कठिन विधि नहीं है. सबसे पहले राजयोग के लिए स्वयं का और परमात्मा का परिचय होना आवश्यक है. मौ कोन हॅूं और मुझे किसके साथ योग लगाना है ? अगर हम अपने-आपको देह समझेंगे तो हम परमात्मा के साथ कभी भी योगयुक्त नहीं हो सकेंगे. देह अभिमान समझने से यही संकल्प आयेगे - `मौ पिता हँू` तो बच्चे याद आयेंगे, ``मौ शिक्षक हँू`` तो विद्यार्थी याद आयेगें ``मौ व्यापारी हँू`` तो ग्राहक याद आयेंगे. लेकिन जब स्वयं को आत्मा निश्चय करेंगे तब ही परमात्मा याद आयेगा. इस प्रकार राजयोग की पहली सीढ़ी है - आत्मा और परमात्मा के पूर्ण परिचय के आधार पर दोनों मे निश्चय. दोनों का परिचय तो दूसरे और तीसरे सत्र मं मिला है, अब परमात्मा के साथ आत्मा का किस प्रकार के सम्बन्ध और उसको याद करने की विधी
राजयोग का आधार और विधी
योग का अति सरल अर्थ है - किसी की याद. किसी भी याद आना या किसी को याद करना - यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है. मन जिस विषय पर सोचता है, उसी के साथ उस आत्मा का योग है. फिर वह चाहे व्यक्ति, वस्तु, वौभव या परिस्थिति हो या परमात्मा ही क्यों न हो. अब मन कहाँ-कहाँ जा सकता है, मन का कहीं भी जाने का आधार क्या हैं ? संसार में करोड़ो मनुष्य है लेकिन मन सभी के विषय में नहीं सोचता है. मन उसी के बारें में सोचेगा, जिसका उसे परिचय हो तो पहला आधार है परिचय. फिर जिसके साथ सम्बन्ध तीसरा आधार है स्नेह. जिससे स्नेह होता है उसके पास मन अपने आप चला जाता है. चौथा आधार है प्राप्ति. जहाँ से किसी को प्राप्ति होगी वहाँ से वह अपना मन हटाना ही नही चाहेंगा. तो किसी की भी याद के लिए मुख्य चार आधार है - परिचय, सम्बधन्ध, स्नेह और प्रापित. इनहीं चा आधारों के कारण मनुष्य की याद सदा बदलती ही रहती है या परिवर्तनशील होती है. एक बालक का योग अपनी माता के साथ है क्योंकि उसको केवल माँ का परिचय है. माँ से ही उसे स्नेह मिलता है, भोजन मिलता है. माँ को न देखने पर वह रोता है और माँ के उसे उठाने पर वह चुप हो जाता है. इससे सिध्द है कि उसका योग अपनी माता के साथ है. बालक थोड़ा बड़ा होने पर खेलकूद में रस लेने लगता है तब उसका योग माँ से परिवर्तित होकर अपने दोस्तों और खेल में जुट जाता है और माँ का बुलावा भी वह टालने की कोशिश करता है. विद्यार्थी जीवन में बच्चे का योग अपनी पढ़ाई, पाठशाला और शिखक से हो जाता है. व्यावहारिक जीवन में आने के बाद उसका योग - धन, सम्पत्ति, मर्तबा, इज्जत, अन्य सम्पर्क मंे आने वाले व्यक्तियों के साथ हो जाता है, विवाह होने पर कुछ समय के लिए उसका योग पत्नी के साथ हो जाता है. सन्तान होने पर पत्नी से भी योग हटकर सन्तान से हो जाता है. बीमारी के दिनों में पूरा ही योग डॉक्टर के साथ होता है. क्योंकि उससे ही इलाज होना है. इस प्रकार योग परिवर्तनशील है तो फिर देहधारियोंे से योग हटाकर परमात्मा से योग लगाना कठिन क्यों होना चाहिए, जहाँ परिचय, सम्बध, स्नेह और प्राप्ति है वहाँ योग लगाना बड़ा ही सहज है, अब ये चारों ही आधार परमात्मा से जोड़े जाएँ तो राजयोग कोई कठिन विधि नहीं है.
सबसे पहले राजयोग के लिए स्वयं का और परमात्मा का परिचय होना आवश्यक है. मौ कोन हॅूं और मुझे किसके साथ योग लगाना है ? अगर हम अपने-आपको देह समझेंगे तो हम परमात्मा के साथ कभी भी योगयुक्त नहीं हो सकेंगे. देह अभिमान समझने से यही संकल्प आयेगे - `मौ पिता हँू` तो बच्चे याद आयेंगे, ``मौ शिक्षक हँू`` तो विद्यार्थी याद आयेगें ``मौ व्यापारी हँू`` तो ग्राहक याद आयेंगे. लेकिन जब स्वयं को आत्मा निश्चय करेंगे तब ही परमात्मा याद आयेगा. इस प्रकार राजयोग की पहली सीढ़ी है - आत्मा और परमात्मा के पूर्ण परिचय के आधार पर दोनों मे निश्चय. दोनों का परिचय तो दूसरे और तीसरे सत्र मं मिला है,
अब परमात्मा के साथ आत्मा का किस प्रकार के सम्बन्ध और उसको याद करने की विधी
योग का अति सरल अर्थ है - किसी की याद. किसी भी याद आना या किसी को याद करना - यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है. मन जिस विषय पर सोचता है, उसी के साथ उस आत्मा का योग है. फिर वह चाहे व्यक्ति, वस्तु, वौभव या परिस्थिति हो या परमात्मा ही क्यों न हो. अब मन कहाँ-कहाँ जा सकता है, मन का कहीं भी जाने का आधार क्या हैं ? संसार में करोड़ो मनुष्य है लेकिन मन सभी के विषय में नहीं सोचता है. मन उसी के बारें में सोचेगा, जिसका उसे परिचय हो तो पहला आधार है परिचय. फिर जिसके साथ सम्बन्ध तीसरा आधार है स्नेह. जिससे स्नेह होता है उसके पास मन अपने आप चला जाता है. चौथा आधार है प्राप्ति. जहाँ से किसी को प्राप्ति होगी वहाँ से वह अपना मन हटाना ही नही चाहेंगा. तो किसी की भी याद के लिए मुख्य चार आधार है - परिचय, सम्बधन्ध, स्नेह और प्रापित. इनहीं चा आधारों के कारण मनुष्य की याद सदा बदलती ही रहती है या परिवर्तनशील होती है. एक बालक का योग अपनी माता के साथ है क्योंकि उसको केवल माँ का परिचय है. माँ से ही उसे स्नेह मिलता है, भोजन मिलता है. माँ को न देखने पर वह रोता है और माँ के उसे उठाने पर वह चुप हो जाता है. इससे सिध्द है कि उसका योग अपनी माता के साथ है. बालक थोड़ा बड़ा होने पर खेलकूद में रस लेने लगता है तब उसका योग माँ से परिवर्तित होकर अपने दोस्तों और खेल में जुट जाता है और माँ का बुलावा भी वह टालने की कोशिश करता है. विद्यार्थी जीवन में बच्चे का योग अपनी पढ़ाई, पाठशाला और शिखक से हो जाता है. व्यावहारिक जीवन में आने के बाद उसका योग - धन, सम्पत्ति, मर्तबा, इज्जत, अन्य सम्पर्क मंे आने वाले व्यक्तियों के साथ हो जाता है, विवाह होने पर कुछ समय के लिए उसका योग पत्नी के साथ हो जाता है. सन्तान होने पर पत्नी से भी योग हटकर सन्तान से हो जाता है. बीमारी के दिनों में पूरा ही योग डॉक्टर के साथ होता है. क्योंकि उससे ही इलाज होना है. इस प्रकार योग परिवर्तनशील है तो फिर देहधारियोंे से योग हटाकर परमात्मा से योग लगाना कठिन क्यों होना चाहिए, जहाँ परिचय, सम्बध, स्नेह और प्राप्ति है वहाँ योग लगाना बड़ा ही सहज है, अब ये चारों ही आधार परमात्मा से जोड़े जाएँ तो राजयोग कोई कठिन विधि नहीं है.
सबसे पहले राजयोग के लिए स्वयं का और परमात्मा का परिचय होना आवश्यक है. मौ कोन हॅूं और मुझे किसके साथ योग लगाना है ? अगर हम अपने-आपको देह समझेंगे तो हम परमात्मा के साथ कभी भी योगयुक्त नहीं हो सकेंगे. देह अभिमान समझने से यही संकल्प आयेगे - `मौ पिता हँू` तो बच्चे याद आयेंगे, ``मौ शिक्षक हँू`` तो विद्यार्थी याद आयेगें ``मौ व्यापारी हँू`` तो ग्राहक याद आयेंगे. लेकिन जब स्वयं को आत्मा निश्चय करेंगे तब ही परमात्मा याद आयेगा. इस प्रकार राजयोग की पहली सीढ़ी है - आत्मा और परमात्मा के पूर्ण परिचय के आधार पर दोनों मे निश्चय. दोनों का परिचय तो दूसरे और तीसरे सत्र मं मिला है,
अब परमात्मा के साथ आत्मा का किस प्रकार के सम्बन्ध और उसको याद करने की विधी
Saturday, October 29, 2011
शिव सर्वआत्माओं के परमपिता हैं परमपिता परमात्मा शिव का यही परिचय यदि सर्व मनुष्यात्माओं को दिया जाए तो सभी सम्प्रदायों को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है, क्योंकि परमात्मा शिव का स्मृतिचि- शिवलिंग के रूप में सर्वत्र सर्वधर्मावलंबियों द्वारा मान्य है। यद्यपि मुसलमान भाई मूर्ति पूजा नहीं करते हैं तथापिवे मक्का में संग-ए-असवद नामक पत्थर को आदर से चूमते हैं। क्योंकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि यह भगवान का भेजा हुआ है। अतः यदि उन्हें यह मालूम पड़ जाए कि खुदा अथवा भगवान शिव एक ही हैं तो दोनों धर्मों से भावनात्मक एकता हो सकती है। इसी प्रकार ओल्ड टेस्टामेंट में मूसा ने जेहोवा का वर्णन किया है। वह ज्योतिर्बिंदु परमात्मा का ही यादगार है। इस प्रकार विभिन्न धर्मों के बीच मैत्री भावना स्थापित हो सकती है। रामेश्वरम् में राम के ईश्वर शिव, वृंदावन में श्रीकृष्ण के ईष्ट गोपेश्वर तथा एलीफेंटा में त्रिमूर्ति शिव के चित्रों से स्पष्ट है कि सर्वात्माओं के आराध्य परमपिता परमात्मा शिव ही हैं। शिवरात्रि का त्योहार सभी धर्मों का त्योहार है तथा सभी धर्मवालों के लिए भारतवर्ष तीर्थ है। यदि इस प्रकार का परिचय दिया जाता है तो विश्व का इतिहास ही कुछ और होता तथा साम्प्रदायिक दंगे, धार्मिक मतभेद, रंगभेद, जातिभेद इत्यादि नहीं होते। चहुँओर भ्रातृत्व की भावना होती। आज पुनः वही घड़ी है, वही दशा है, वही रात्रि है जब मानव समाज पतन की चरम सीमा तक पहुँच चुका है। ऐसे समय में कल्प की महानतम घटना तथा दिव्य संदेश सुनाते हुए हमें अति हर्ष हो रहा है कि कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के इस संगमयुग पर ज्ञान-सागर, प्रेम वकरुणा के सागर, पतित-पावन, स्वयंभू परमात्मा शिव हम मनुष्यात्माओं की बुझी हुई ज्योति जगाने हेतु अवतरित हो चुके हैं। वे साकार प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम द्वारा सहज ज्ञान व सहज राजयोग की शिक्षा देकर विकारों के बंधन से मुक्त कर निर्विकारी पावन देव पद की प्राप्ति कराकर दैवी स्वराज्य की पुनः स्थापना करा रहे हैं।
Friday, 11 November 2011
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
सातारा, दि. 15 :cc प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
Tuesday, 1 November 2011
सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है प्राय: लोग यह नारा तो लगाते है कि " hindu, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी आपस में भाई-भाई है " परन्तु वे सभी आपस में भाई-भाई कैसे है और यदि वे भाई -भाई है तो उन सभी का एक पिता कौन है - इसे वे नही जानते देह कि दृष्टी से तो वे सभी भाई-भाई हो नही सकते क्योंकि उनके माता-पिता अलग-अलग है, आत्मिक दृष्टी से ही वे सभी एक परमपिता परमात्मा कि संतान होने के नाते से भाई-भाई है यंहा सभी आत्माओं के एक परमपिता का परिचय दिया गया है इस स्मृति में स्थित होने से राष्ट्रीय एकता हो सकती है I प्राय: सभी धर्मो के लोग कहते है कि परमात्मा एक है और सभी का पिता है और सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई है परन्तु प्रश्न उठता है कि वह एक परलौकिक परमपिता कौन है जिसे सभी मानते है ? आप देखेंगे कि भले ही हरेक धर्म के स्थापक अलग-अलग है परन्तु हरेक धर्म के अनुयायी निराकार, ज्योति-स्वरुप परमात्मा शिव कि प्रतिमा (शिवलिंग) को किसी-न-किसी प्रकार मान्यता देते है Iभारत वर्ष में तो स्थान-स्थान पर परमपिता परमात्मा शिव के मंदिर है ही और भक्त जन "ओ३म नमो शिवाय" तथा तुम्ही हो माता तुम्ही पिता हो इत्यादि शब्दों से उनका गायन व् पूजन भी करते है और शिव को श्रीकृष्ण तथा श्री राम इत्यादि देवो के भी देव अर्थात परमपूज्य मानते ही है परन्तु भारत से बाहर, दुसरे धर्मो के लोग भी इसको मान्यता देते है I यहाँ सामने दिए चित्र में दिखाया गया है कि शिव का स्मृति चिन्ह सभी धर्मो में है I अमरनाथ, विश्वनाथ,सोमनाथ और पशुपतिनाथ इत्यादि मंदिरों में परमपिता परमात्मा शिव ही के स्मरण चिन्ह है "गोपेश्वर तथा रामेश्वर के जो मंदिर है उनसे स्पष्ट है कि शिव श्री कृष्ण तथा श्री राम के भी पूज्य है रजा विक्रमादित्य भी शिव ही कि पूजा करते थे I मुसलमानों के मुख्य तीर्थ मक्का में भी एक इसी आकार का पत्थर है जिसे कि सभी मुसलमान यात्री बड़े प्यार व सम्मान से चुमते है उसे वे "संगे-असवद" कहते है और इब्राहीम तथा मुहम्मद द्वारा उनकी स्थापना हुई मानते हैI परन्तु आज वे भी इस रहस्य को नही जानते है कि उनके धर्म में बुतपरस्ती (प्रतिमा पूजा) कि मान्यता न होते हुए भी इस आकार वाले पत्थर की स्थापना क्यों की गई है I और उनके यहाँ इसे प्यार व सम्मान से चूमने की प्रथा क्यों चली आती है ? इटली में कई रोमन कैथोलिक्स ईसाई भी इसी प्रकार वाली प्रतिमा को अपने ढंग से पूजते है ईसाइयों के धर्म स्थापक ईसा ने तथा सिक्खों के धर्म स्थापक नानकजी ने भी परमात्मा को एक निराकार ज्योति ही माना है Iयहूदी लोग तो परमात्मा को "जेहोवा" नाम से पुकारते है जो नाम शिव का ही रूपांतरण मालूम होता है जापान में भी बौद्द धर्म के कई अनुयायी इसी प्रकार की एक प्रतिमा अपने सामने रखकर उस पर अपना मन एकाग्र करते है I परन्तु समयांतर में सभी धर्मो के लोग यह मूल बात भूल गए की शिवलिंग सभी मनुष्यात्माओं के परमपिता का स्मरण-चिन्ह है यदि मुसलमान यह बात जानते होते तो वे सोमनाथ को मंदिर को कभी न लुटते , बल्कि मुसलमान ,ईसाई इत्यादि सभी शर्मो के अनुयायी भारत को ही परमपिता परमात्मा की अवतार-भूमि मानकर इसे अपना सबसे मुख्य तीर्थ मानते और इसी प्रकार संसार का इतिहास ही कुछ और होता परन्तु एक पिता को भूलने के कारण संसार में लड़ाई-झगडा, दुःख तथा क्लेश हुआ और सभी अनाथ व कंगाल बन गए I
सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है प्राय: लोग यह नारा तो लगाते है कि " hindu, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी आपस में भाई-भाई है " परन्तु वे सभी आपस में भाई-भाई कैसे है और यदि वे भाई -भाई है तो उन सभी का एक पिता कौन है - इसे वे नही जानते देह कि दृष्टी से तो वे सभी भाई-भाई हो नही सकते क्योंकि उनके माता-पिता अलग-अलग है, आत्मिक दृष्टी से ही वे सभी एक परमपिता परमात्मा कि संतान होने के नाते से भाई-भाई है यंहा सभी आत्माओं के एक परमपिता का परिचय दिया गया है इस स्मृति में स्थित होने से राष्ट्रीय एकता हो सकती है I प्राय: सभी धर्मो के लोग कहते है कि परमात्मा एक है और सभी का पिता है और सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई है परन्तु प्रश्न उठता है कि वह एक परलौकिक परमपिता कौन है जिसे सभी मानते है ? आप देखेंगे कि भले ही हरेक धर्म के स्थापक अलग-अलग है परन्तु हरेक धर्म के अनुयायी निराकार, ज्योति-स्वरुप परमात्मा शिव कि प्रतिमा (शिवलिंग) को किसी-न-किसी प्रकार मान्यता देते है Iभारत वर्ष में तो स्थान-स्थान पर परमपिता परमात्मा शिव के मंदिर है ही और भक्त जन "ओ३म नमो शिवाय" तथा तुम्ही हो माता तुम्ही पिता हो इत्यादि शब्दों से उनका गायन व् पूजन भी करते है और शिव को श्रीकृष्ण तथा श्री राम इत्यादि देवो के भी देव अर्थात परमपूज्य मानते ही है परन्तु भारत से बाहर, दुसरे धर्मो के लोग भी इसको मान्यता देते है I यहाँ सामने दिए चित्र में दिखाया गया है कि शिव का स्मृति चिन्ह सभी धर्मो में है I अमरनाथ, विश्वनाथ,सोमनाथ और पशुपतिनाथ इत्यादि मंदिरों में परमपिता परमात्मा शिव ही के स्मरण चिन्ह है "गोपेश्वर तथा रामेश्वर के जो मंदिर है उनसे स्पष्ट है कि शिव श्री कृष्ण तथा श्री राम के भी पूज्य है रजा विक्रमादित्य भी शिव ही कि पूजा करते थे I मुसलमानों के मुख्य तीर्थ मक्का में भी एक इसी आकार का पत्थर है जिसे कि सभी मुसलमान यात्री बड़े प्यार व सम्मान से चुमते है उसे वे "संगे-असवद" कहते है और इब्राहीम तथा मुहम्मद द्वारा उनकी स्थापना हुई मानते हैI परन्तु आज वे भी इस रहस्य को नही जानते है कि उनके धर्म में बुतपरस्ती (प्रतिमा पूजा) कि मान्यता न होते हुए भी इस आकार वाले पत्थर की स्थापना क्यों की गई है I और उनके यहाँ इसे प्यार व सम्मान से चूमने की प्रथा क्यों चली आती है ? इटली में कई रोमन कैथोलिक्स ईसाई भी इसी प्रकार वाली प्रतिमा को अपने ढंग से पूजते है ईसाइयों के धर्म स्थापक ईसा ने तथा सिक्खों के धर्म स्थापक नानकजी ने भी परमात्मा को एक निराकार ज्योति ही माना है Iयहूदी लोग तो परमात्मा को "जेहोवा" नाम से पुकारते है जो नाम शिव का ही रूपांतरण मालूम होता है जापान में भी बौद्द धर्म के कई अनुयायी इसी प्रकार की एक प्रतिमा अपने सामने रखकर उस पर अपना मन एकाग्र करते है I परन्तु समयांतर में सभी धर्मो के लोग यह मूल बात भूल गए की शिवलिंग सभी मनुष्यात्माओं के परमपिता का स्मरण-चिन्ह है यदि मुसलमान यह बात जानते होते तो वे सोमनाथ को मंदिर को कभी न लुटते , बल्कि मुसलमान ,ईसाई इत्यादि सभी शर्मो के अनुयायी भारत को ही परमपिता परमात्मा की अवतार-भूमि मानकर इसे अपना सबसे मुख्य तीर्थ मानते और इसी प्रकार संसार का इतिहास ही कुछ और होता परन्तु एक पिता को भूलने के कारण संसार में लड़ाई-झगडा, दुःख तथा क्लेश हुआ और सभी अनाथ व कंगाल बन गए I
Saturday, 29 October 2011
आत्मा क्या है और मन क्या है ? अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
तीन लोक कौन से है और शिव का धाम कौनसा है ? इन पुरियो के भी पार एक और लोक है जिसे ब्रह्मलोक , परलोक , मुक्तिधाम , शांतिधाम , शिवलोक इत्यादी नामो से यद् किया जाता है इसमे सुनहरे लाल रंग का प्रकाश फैला हुआ है जिसे ही ब्रह्म-तत्व , छठा तत्व अथवा महातत्व कहा जा सकता है इसके अंशमात्र ही में ज्योतिर्बिंदु आत्माये मुक्ति की अवस्था में रहती है यहाँ हरेक धर्म की आत्माओ के संस्थान है I उन सभी के ऊपर , सदा मुक्त ,चेतन्य , ज्योतिबिंदु रूप परमात्मा "सदाशिव " का निवास स्थान है इस लोक में मनुष्यात्मा कल्प के अंत में , सृष्टि का महाविनाश होने के बाद अपने-अपने कर्मो का फल भोग कर तथा पवित्र होकर ही जाती हैI यहाँ मनुष्यात्मा देह बंधन ,कर्म-बंधन तथा जन्म मरण से रहित होती है यहाँ न संकल्प है , न वचन और न कर्म इ इस लोक में परमपिता परमात्मा शिव के सिवाय अन्य कोई "गुरु " इत्यादी नही ले जा सकता इस लोक में जाना ही अमरनाथ ,रामेश्वरम अथवा विश्वेश्वर नाथ की सच्ची यात्रा करना है, क्योंकि अमरनाथ परमपिता शिव यही रहते है I
तीन लोक कौन से है
और
शिव का धाम कौनसा है ?
मनुष्यात्माये मुक्ति अथवा पूर्ण शांति की शुभ इच्छा तो करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है की मुक्तिधाम अथवा शांतिधाम है कहाँ ? इसी प्रकार , परम प्रिय परमात्मा शिव से मनुष्यात्माये मिलना तो चाहती है और उसे याद भी करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है कि वह पवित्र धाम कहाँ है जहा से आकर परमपिता शिव इसी सृष्टि पर अवतरित होते है ? यह कितने अश्च्चार्य की बात है की जहाँ से हम सभी मनुष्यात्माये सृष्टि रूपी रंगमंच पर आयी है, उस प्यारे देश को सभी भूल गयी है और वापिस भी नही जा सकती I
१. साकार मनुष्य लोक -सामने चित्र में दिखाया गया है कि एक है यह साकार मनुष्य लोक जिसमे इस समय हम है ईसमे सभी आत्माए हड्डी-मांसादी का स्थूल शरीर लेकर कर्म करती है और उसका फल सुख दुःख के रूप में भोगती है तथा जन्म-मरण के चक्कर में भी आती है I इस लोक में संकल्प , ध्वनि और कर्म तीनो है I इसे ही " पञ्च तत्वों कि सृष्टि अथवा "कर्म- क्षेत्र "भी कहते है इ यह सृष्टि आकाश तत्व के अंश मात्र में है इ इसे सामने त्रिलोक के चित्र में दिखाया गया है क्योंकि इसके बीज रूप परमात्मा शिव , जो कि जन्म -मरण से न्यारे है , ऊपर रहते है I
२. सूक्ष्म देवताओ का लोक -इस मनुष्य लोक के सूर्य तथा तारागण के पार तथा आकाश तत्व के भी पार एक सूक्ष्म लोक है जहा प्रकाश ही प्रकाश है उस प्रकाश के अंश-मात्र में ब्रह्मा , विष्णु तथा महादेव शंकर की अलग अलग पुरिया है इन देवताओं के शरीर हड्डी-मांसादी के नहीं बल्कि प्रकाश के है इन्हें दिव्य चक्षुओ के द्वारा ही देखा जा सकता है यहाँ दुःख अथवा अशांति नही होती यहाँ संकल्प तो होते है और क्रियाए भी होती है और बातचीत भी होती है परन्तु आवाज नही होती I
३. ब्रह्मलोक और परलोक - इन पुरियो के भी पार एक और लोक है जिसे ब्रह्मलोक , परलोक , मुक्तिधाम , शांतिधाम , शिवलोक इत्यादी नामो से यद् किया जाता है इसमे सुनहरे लाल रंग का प्रकाश फैला हुआ है जिसे ही ब्रह्म-तत्व , छठा तत्व अथवा महातत्व कहा जा सकता है इसके अंशमात्र ही में ज्योतिर्बिंदु आत्माये मुक्ति की अवस्था में रहती है यहाँ हरेक धर्म की आत्माओ के संस्थान है I
उन सभी के ऊपर , सदा मुक्त ,चेतन्य , ज्योतिबिंदु रूप परमात्मा "सदाशिव " का निवास स्थान है इस लोक में मनुष्यात्मा कल्प के अंत में , सृष्टि का महाविनाश होने के बाद अपने-अपने कर्मो का फल भोग कर तथा पवित्र होकर ही जाती हैI यहाँ मनुष्यात्मा देह बंधन ,कर्म-बंधन तथा जन्म मरण से रहित होती है यहाँ न संकल्प है , न वचन और न कर्म इ इस लोक में परमपिता परमात्मा शिव के सिवाय अन्य कोई "गुरु " इत्यादी नही ले जा सकता इस लोक में जाना ही अमरनाथ ,रामेश्वरम अथवा विश्वेश्वर नाथ की सच्ची यात्रा करना है, क्योंकि अमरनाथ परमपिता शिव यही रहते है I
और
शिव का धाम कौनसा है ?
मनुष्यात्माये मुक्ति अथवा पूर्ण शांति की शुभ इच्छा तो करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है की मुक्तिधाम अथवा शांतिधाम है कहाँ ? इसी प्रकार , परम प्रिय परमात्मा शिव से मनुष्यात्माये मिलना तो चाहती है और उसे याद भी करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है कि वह पवित्र धाम कहाँ है जहा से आकर परमपिता शिव इसी सृष्टि पर अवतरित होते है ? यह कितने अश्च्चार्य की बात है की जहाँ से हम सभी मनुष्यात्माये सृष्टि रूपी रंगमंच पर आयी है, उस प्यारे देश को सभी भूल गयी है और वापिस भी नही जा सकती I
१. साकार मनुष्य लोक -सामने चित्र में दिखाया गया है कि एक है यह साकार मनुष्य लोक जिसमे इस समय हम है ईसमे सभी आत्माए हड्डी-मांसादी का स्थूल शरीर लेकर कर्म करती है और उसका फल सुख दुःख के रूप में भोगती है तथा जन्म-मरण के चक्कर में भी आती है I इस लोक में संकल्प , ध्वनि और कर्म तीनो है I इसे ही " पञ्च तत्वों कि सृष्टि अथवा "कर्म- क्षेत्र "भी कहते है इ यह सृष्टि आकाश तत्व के अंश मात्र में है इ इसे सामने त्रिलोक के चित्र में दिखाया गया है क्योंकि इसके बीज रूप परमात्मा शिव , जो कि जन्म -मरण से न्यारे है , ऊपर रहते है I
२. सूक्ष्म देवताओ का लोक -इस मनुष्य लोक के सूर्य तथा तारागण के पार तथा आकाश तत्व के भी पार एक सूक्ष्म लोक है जहा प्रकाश ही प्रकाश है उस प्रकाश के अंश-मात्र में ब्रह्मा , विष्णु तथा महादेव शंकर की अलग अलग पुरिया है इन देवताओं के शरीर हड्डी-मांसादी के नहीं बल्कि प्रकाश के है इन्हें दिव्य चक्षुओ के द्वारा ही देखा जा सकता है यहाँ दुःख अथवा अशांति नही होती यहाँ संकल्प तो होते है और क्रियाए भी होती है और बातचीत भी होती है परन्तु आवाज नही होती I
३. ब्रह्मलोक और परलोक - इन पुरियो के भी पार एक और लोक है जिसे ब्रह्मलोक , परलोक , मुक्तिधाम , शांतिधाम , शिवलोक इत्यादी नामो से यद् किया जाता है इसमे सुनहरे लाल रंग का प्रकाश फैला हुआ है जिसे ही ब्रह्म-तत्व , छठा तत्व अथवा महातत्व कहा जा सकता है इसके अंशमात्र ही में ज्योतिर्बिंदु आत्माये मुक्ति की अवस्था में रहती है यहाँ हरेक धर्म की आत्माओ के संस्थान है I
उन सभी के ऊपर , सदा मुक्त ,चेतन्य , ज्योतिबिंदु रूप परमात्मा "सदाशिव " का निवास स्थान है इस लोक में मनुष्यात्मा कल्प के अंत में , सृष्टि का महाविनाश होने के बाद अपने-अपने कर्मो का फल भोग कर तथा पवित्र होकर ही जाती हैI यहाँ मनुष्यात्मा देह बंधन ,कर्म-बंधन तथा जन्म मरण से रहित होती है यहाँ न संकल्प है , न वचन और न कर्म इ इस लोक में परमपिता परमात्मा शिव के सिवाय अन्य कोई "गुरु " इत्यादी नही ले जा सकता इस लोक में जाना ही अमरनाथ ,रामेश्वरम अथवा विश्वेश्वर नाथ की सच्ची यात्रा करना है, क्योंकि अमरनाथ परमपिता शिव यही रहते है I
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